आखरी पड़ाव
जंगल के खुले मैदान में एक झुंड जंगली भैंसों का चर रहा था। झुंड के साथ एक छोटा बछड़ा भी था, जो अभी दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा था। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, क्या इस जंगल में ऐसा कोई जानवर है जिससे हमें डरना चाहिए?" भैंसा धीरे से मुस्कराया और बोला, "हाँ, बेटे। इस जंगल में शेर सबसे खतरनाक होते हैं। उनसे सावधान रहना।" बछड़ा थोड़ा डर गया और बोला, "अगर मुझे कभी शेर दिखा, तो मैं जितना तेज़ दौड़ सकता हूँ, उतना तेज़ भाग जाऊँगा!" यह सुनकर भैंसे ने गंभीर होते हुए कहा, "नहीं बेटे, यह सबसे बड़ी गलती होगी!"
बछड़ा चौंक गया। उसे समझ नहीं आया कि भागना कैसे गलत हो सकता है। उसने पूछा, "लेकिन क्यों? अगर मैं भागूँगा नहीं, तो शेर मुझे मार सकता है!" भैंसा गहरी आवाज़ में समझाने लगा, "अगर तुम डरकर भागोगे, तो शेर तुम्हारा पीछा करेगा। वह बहुत तेज़ दौड़ता है, और जब तुम थक जाओगे, तो वह तुम्हारी पीठ पर झपटेगा और तुम्हें गिरा देगा। एक बार गिर गए, तो फिर बचने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।" बछड़ा घबरा गया, "तो फिर मुझे करना क्या चाहिए?"
भैंसा शांत स्वर में बोला, "अगर तुम कभी भी शेर को देखो, तो अपनी जगह पर मजबूती से खड़े रहो। उससे नजरें मत चुराओ, बल्कि सीधा उसकी आँखों में देखो। उसे दिखाओ कि तुम डरे हुए नहीं हो। अगर वह फिर भी तुम्हें घूरता रहे, तो अपनी तेज़ सींगें दिखाओ और खुरों को ज़मीन पर पटको। और अगर वह अब भी ना भागे, तो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ो। जब तुम्हें लगे कि अब और इंतज़ार नहीं किया जा सकता, तो पूरी ताकत से उस पर हमला कर दो!"
बछड़ा थोड़ा हिचकिचाया और बोला, "लेकिन अगर शेर ने पलटकर मुझ पर हमला कर दिया तो?" भैंसा मुस्कराया और बोला, "बेटे, चारों ओर देखो।" बछड़े ने इधर-उधर देखा, उसके चारों ओर ताकतवर भैंसों का झुंड खड़ा था। "अगर तुम डरकर भागोगे, तो हम तुम्हारी मदद नहीं कर पाएँगे। लेकिन अगर तुम साहस दिखाओगे और लड़ने के लिए खड़े रहोगे, तो हम सब तुम्हारे साथ खड़े होंगे।" यह सुनकर बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को धन्यवाद दिया।
सीख: मुसीबतों से भागने से वे और बड़ी हो जाती हैं। लेकिन जब हम उनका सामना करते हैं, तो हमें एहसास होता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे परिवार और दोस्त हमारे साथ खड़े होते हैं। इसलिए, डर से भागने के बजाय, उसका सामना करना ही असली ताकत होती है।
चिड़िया और किसान
एक गाँव में एक किसान रहता था। उसके खेत में एक चिड़िया ने अपना घोंसला बना लिया था। कुछ समय बाद उसने दो अंडे दिए, जिनसे दो प्यारे से बच्चे निकले। चिड़िया अपने बच्चों को प्यार से पाल रही थी, और वे खेत में मस्ती से रहते थे। लेकिन समय बीता और फसल पक गई। अब कटाई का समय आ गया था। एक दिन, चिड़िया के बच्चों ने किसान को यह कहते सुना, "कल मैं अपने पड़ोसी से कहूँगा कि आकर फसल काट दे।" यह सुनकर वे घबरा गए। जब उनकी माँ वापस आई, तो उन्होंने चिंतित होकर कहा, "माँ, हमें यह खेत छोड़कर कहीं और जाना होगा। कल किसान फसल कटवा देगा!"
माँ मुस्कराई और बोली, "इतनी जल्दी नहीं, बच्चों। मुझे नहीं लगता कि कल कटाई होगी।" अगली सुबह, जब बच्चे जागे, तो उन्होंने देखा कि फसल वैसे की वैसी ही खड़ी थी। पड़ोसी नहीं आया था। शाम को फिर किसान खेत में आया और खुद से बड़बड़ाने लगा, "मेरा पड़ोसी तो नहीं आया। अब कल मैं अपने किसी रिश्तेदार से कहूँगा कि आकर फसल काट दे।" बच्चों ने फिर माँ को यह बात बताई। माँ ने हँसते हुए कहा, "चिंता मत करो, हमें अभी भी जाने की जरूरत नहीं है।"
जैसा माँ ने कहा, वैसा ही हुआ। किसान का रिश्तेदार भी नहीं आया। अब किसान परेशान हो गया। उसने खुद से कहा, "अब बहुत हो गया! कल मैं खुद आकर फसल काटूँगा!" बच्चों ने जब माँ को यह बात बताई, तो इस बार वह गंभीर हो गई। "बच्चों, अब हमें जाना होगा। किसान अब खुद काम करने वाला है, और अब फसल कटकर ही रहेगी।" उसी रात, चिड़िया अपने बच्चों को लेकर खेत छोड़कर उड़ गई।
सीख: अगर कोई काम वाकई पूरा करना है, तो दूसरों पर निर्भर न रहें। जब तक हम अपने काम की जिम्मेदारी खुद नहीं लेते, तब तक वह पूरा नहीं होता।
दुःख का कारण
एक शहर में एक शानदार मकान था, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे। लेकिन एक दिन, उस मकान के मालिक ने देखा कि उसका घर जल रहा है! आग की लपटें उठ रही थीं, और चारों तरफ लोगों की भीड़ थी। वह आदमी घबरा गया और मदद की गुहार लगाने लगा। तभी उसका बड़ा बेटा आया और बोला, "पिताजी, चिंता मत करें। मैंने यह घर अच्छे दामों में बेच दिया था। अब यह हमारा नहीं है!" यह सुनकर पिता को राहत मिली। अब वह आराम से खड़ा होकर जलते हुए मकान को देखने लगा।
तभी दूसरा बेटा आया और बोला, "पिताजी, आप इतने निश्चिंत क्यों हैं? यह घर अभी भी हमारा ही है। सौदा पक्का नहीं हुआ है!" यह सुनते ही पिता फिर घबरा गया और मदद की गुहार लगाने लगा। तभी तीसरा बेटा आया और बोला, "पिताजी, चिंता मत करें! खरीदार बहुत ईमानदार है। उसने कहा है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह सौदा नहीं तोड़ेगा।" अब पिता फिर से शांत हो गया और जलते घर को देखने लगा।
सीख: दुख और चिंता सिर्फ हमारी सोच पर निर्भर करते हैं। जब हम किसी चीज़ को 'अपना' मानते हैं, तो उसके खोने का डर सताने लगता है। लेकिन जब हम समझ जाते हैं कि चीजें हमेशा हमारी नहीं होतीं, तो दुःख खुद-ब-खुद कम हो जाता है। इसलिए, जीवन में चीजों को पकड़कर रखने की बजाय, उन्हें जाने देना सीखना चाहिए।