गर्मी की दोपहर थी। बाज़ार की सड़कें धूल और भीड़ से भरी थीं। लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। ऐसे में एक फटे-पुराने कपड़ों में लिपटा हुआ भिखारी, बाज़ार के कोने में बैठा, लोगों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा था। उसे सुबह से एक दाना भी नसीब नहीं हुआ था।
तभी उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी एक चीज़ पर पड़ी। वो चमड़े का एक पुराना सा बटुआ था। भिखारी ने उसे उठाया, झाड़ा और खोलकर देखा। उसकी आँखें हैरानी से चमक उठीं। बटुए में सोने की सौ चमचमाती अशर्फियाँ थीं।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसकी गरीबी, भूख और वर्षों की बेबसी एक पल को उसे ये कहने लगी कि ये भगवान का दिया तोहफ़ा है। लेकिन अगले ही पल उसके अंदर की ईमानदारी की आवाज़ उठी – "यह मेरा नहीं है, किसी और का खोया हुआ धन है।"
इसी सोच में डूबा हुआ वह खड़ा ही हुआ था कि उसने बाज़ार में एक अमीर सौदागर को ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए देखा, "मेरा बटुआ खो गया है! उसमें दो सौ सोने की अशर्फियाँ थीं! जो कोई भी बटुआ लौटाएगा, उसे अच्छा इनाम मिलेगा!"
भिखारी कुछ क्षणों तक चुप रहा। फिर उसने बटुए को अपने हाथ में मजबूती से पकड़ा और सौदागर के पास जाकर कहा – "सेठ जी, ये लीजिए। शायद ये बटुआ आपका ही है। मुझे रास्ते में पड़ा मिला था।"
सौदागर ने लालच भरी नजरों से भिखारी को देखा। उसने बटुआ झपट लिया और अशर्फियाँ गिनने लगा। कुछ देर बाद वह गुस्से में चिल्लाया – "धोखेबाज़! इसमें तो दो सौ अशर्फियाँ थीं, तुमने आधी रख ली होंगी! और अब इनाम माँग रहे हो? चोर कहीं के!"
भिखारी स्तब्ध रह गया। जिस ईमानदारी से उसने बटुआ लौटाया, उसका ये नतीजा होगा, उसने कभी सोचा भी नहीं था। उसकी आवाज़ काँप रही थी – "सेठ जी, मैं गरीब ज़रूर हूँ, लेकिन चोर नहीं हूँ। अगर आपको मुझ पर शक है, तो हम काजी (जज) के पास चल सकते हैं।"
सौदागर ने तुच्छ भाव से सिर हिलाया, "चलो, देखते हैं तुम्हें क्या सजा मिलती है!"
दोनों अदालत पहुँचे। काजी ने उन्हें ध्यान से देखा और बोला – "पहले तुम बताओ, सेठ जी।"
सौदागर ने पूरा वाकया अपनी तरफ से सुनाया और कहा, "मेरा बटुआ है। उसमें दो सौ अशर्फियाँ थीं। ये भिखारी आधी चुरा चुका है।"
काजी ने फिर भिखारी की बात सुनी। भिखारी ने शांति से कहा – "हुजूर, मुझे बटुआ मिला, मैंने खोला, उसमें सिर्फ सौ अशर्फियाँ थीं। मैंने इन्हें लौटा दिया, अब मुझ पर ही इल्जाम लग रहा है।"
काजी थोड़ी देर तक चुप रहा, फिर मुस्कराया। उसने कहा – "सुनो सेठ जी, तुमने कहा कि तुम्हारे बटुए में दो सौ अशर्फियाँ थीं। लेकिन यह बटुआ तो सिर्फ सौ अशर्फियों वाला है। इसका साफ़ मतलब है कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है।"
सौदागर हक्का-बक्का रह गया।
काजी ने आगे कहा – "क्योंकि ये बटुआ किसी और का नहीं निकला और भिखारी को रास्ते में पड़ा मिला, इसलिए मैं हुक्म देता हूँ कि इसकी आधी रकम (50 अशर्फियाँ) शहर के खज़ाने में जमा कर दी जाए और बाकी की 50 अशर्फियाँ भिखारी को इनाम के तौर पर दी जाएँ।"
अब सौदागर के पास कुछ कहने को नहीं था। वो पछतावे से अपने हाथ मलता रह गया। उसका लालच और झूठ उसी पर भारी पड़ गया था।
वहीं भिखारी की आँखों में अब खुशी के आँसू थे। उसकी ईमानदारी को आखिरकार इंसाफ मिला था। उसने ना सिर्फ एक खोया हुआ बटुआ लौटाया, बल्कि अपनी सच्चाई की मिसाल भी क़ायम की।
सीख (Moral): ईमानदारी का फल देर से मिल सकता है, लेकिन जब मिलता है, तो सम्मान और आत्मसंतोष दोनों साथ लेकर आता है। झूठ और लालच चाहे जितने भी चतुर क्यों न हों, सच्चाई के सामने टिक नहीं सकता।